Tuesday, April 14, 2015
एक बकवादी की कलम से
Saturday, September 6, 2014
शब्द!
शब्दों से ज़्यादा ध्वनि इस मौन की है,
ये बिन कहे बोलता है,
मन पसीजता है,
जब अपना कोई बिन बोले,
मन में भाव तौलता है!!
जीवन कैसी राह है,
यहाँ शब्दों की रणभूमि है,
अब बोलो तो तलवारें,
बिन बोले ललकारें हैं!
बोल तो सब बचपन से रहे हैं,
क्या बोलना है सदियों समझ नहीं आता,
जानवर हमसे बेहतर हैं,
इंसान होके ये बोलने का गम मौत तक नहीं जाता!!
स्वर्णिमा "अग्नि"
Friday, June 20, 2014
अब तक की जीवन यात्रा में हुए अनुभव पर
हंसते लोग बुझते लोग, धीरे धीरे खुलते लोग,
मित्र बनाकर मूर्ख बनाते, भीतर भीतर जलते लोग.
अच्छे भी हैं काफ़ी लोग, बड़ी समझ के बेहतर लोग,
जाने कैसे कब मिल जाएँ, संयोगों के चलते लोग.
हमे मिले हैं कदम कदम पर, बहुत तरह के ऐसे लोग,
हर दिन पढ़कर भी ना समझे, तौबा जाने कैसे लोग!!
स्वर्णिमा "अग्नि"
Thursday, January 12, 2012
प्यारी बिटिया ओमी के लिए
अब भी याद है, जब खुद में तुम्हें महसूस किया था,
पंखुरी सी हिलती, रात दिन मैं सोचा करती
अब तुमने करवट ली होगी, या फिर अंगडाई,
यही कयास लगाते पल बने घंटे और फिर दिन!
महीनों बस जैसे तुम्हीं से दिन होते, तुम्हीं से रात
लोग सोचते पागल है, जब राह चलते तुमसे करती बात!
कोई क्या मानेगा पर तुम भी जैसे मुझको सुनतीं,
और तब जैसे सब कुछ पाकर मैं तुम में ही खोई रहती!
एक दिन फिर कष्टों से लड़ते वो पल आया,
तुम्हें किलकारियां मारते इन बांहों ने सचमुच उठाया,
उफ़! जाने क्या सम्मोहन था,
तुमने देखा मुझको, उन आँखों में मेरा विश्व समाया!
किसी कली से बढ़कर नाज़ुक, पायल सी रुनझुन आवाजें,
सुनते बीते ये सारे दिन, तुम्हें देखते सारी रातें!
अब मुस्काती हो तो जैसे मोती बिखर बिखर जाते हैं,
हम देखें बस तुम्हें एकटक, ऐसे दिन बीते जाते हैं!
बढती जैसे चंद्रकलाएँ, हर दिन नटखट हर दिन चंचल,
मेरा विश्व तुम्हीं तुम ओमी, स्वर्णिम ये पल सबसे सुन्दर!!
स्वर्णिमा "अग्नि"
पंखुरी सी हिलती, रात दिन मैं सोचा करती
अब तुमने करवट ली होगी, या फिर अंगडाई,
यही कयास लगाते पल बने घंटे और फिर दिन!
महीनों बस जैसे तुम्हीं से दिन होते, तुम्हीं से रात
लोग सोचते पागल है, जब राह चलते तुमसे करती बात!
कोई क्या मानेगा पर तुम भी जैसे मुझको सुनतीं,
और तब जैसे सब कुछ पाकर मैं तुम में ही खोई रहती!
एक दिन फिर कष्टों से लड़ते वो पल आया,
तुम्हें किलकारियां मारते इन बांहों ने सचमुच उठाया,
उफ़! जाने क्या सम्मोहन था,
तुमने देखा मुझको, उन आँखों में मेरा विश्व समाया!
किसी कली से बढ़कर नाज़ुक, पायल सी रुनझुन आवाजें,
सुनते बीते ये सारे दिन, तुम्हें देखते सारी रातें!
अब मुस्काती हो तो जैसे मोती बिखर बिखर जाते हैं,
हम देखें बस तुम्हें एकटक, ऐसे दिन बीते जाते हैं!
बढती जैसे चंद्रकलाएँ, हर दिन नटखट हर दिन चंचल,
मेरा विश्व तुम्हीं तुम ओमी, स्वर्णिम ये पल सबसे सुन्दर!!
स्वर्णिमा "अग्नि"
Monday, August 30, 2010
कुछ ख़ास नहीं..
आज कई दिनों बाद फिर से मस्तिष्क जो सोच रहा है वो लिखने डूबते सूरज की उदासी में बैठ गईं हूँ. कुछ ख़ास नहीं, बस यूँ ही... ज़िन्दगी बीतती जा रही है/ कभी कभी देखिये वर्षों कुछ बदलता नहीं, और कभी कभी एक पल ऐसा बीतता है कि उसके बाद कुछ भी कल जैसा रहता नहीं. अजीब सी बात है ना! कल ही पिताजी से बात कर रही थी, उनका मन कुछ भारी देखा तो समझ गई कि उन्हें क्या उलझन व्यथित कर रही है. कैसा सम्बन्ध होता है माता पिता और संतान में, दोनों ही एक दूसरे को बिना कुछ कहे सुने काफी कुछ समझ लेते हैं! उन्हें समझना वैसे उतना कठिन भी नहीं था, आखिर सदा के कर्त्तव्य परायण पिता जी कल सेवानिवृत्त हो रहे हैं. ये बात लोगों को सुनने में अक्सर बहुत आम लगती है कि फलां व्यक्ति रिटायर हो रहे हैं. पर कभी उस व्यक्ति से पूंछ कर देखिये कि ये शब्द सुनकर वो क्या महसूस करता है. जब तक मैं घर पर रही, हमेशा पिता जी को हर रोज़ एक नए जोश के साथ बैंक के लिए रवाना होते देखती रही. क्या मज़ाल कि जूतों में पॉलिश न हो, कपड़ों को बिना प्रेस किये पहनना तो खैर असम्भव था. सुबह माँ तब तक नहीं बैठ पातीं थीं जब तक वो बैंक के लिए रवाना हो न जाएँ/ कुल मिलाकर सुबह का समय कहाँ जाता था कभी पता ही नहीं चला. आज वही पिता जी सुबह उठकर किया क्या जाए, इस चिंता में नहीं डूबे होंगे! कैसे ये जीवन बदल जाता है, एक ही क्षण में व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाता है. यही नहीं, ये दुनियां भी बहुत व्यवहारिक है. इधर अधिकारी कुर्सी से हटा, उधर लोगों के व्यवहार बदल जाते हैं. एक व्यक्ति जो स्वयं जीवन के एक नए खालीपन से संघर्षरत होता है, उसे हमारा ये बुद्धिमान समाज अक्सर बहुत "आम" बात समझकर नगण्य करता रहता है/ मध्यम आयु का एक व्यक्ति जो अभी काफी ऊर्जा से भरपूर है, कल तक ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर सम्माननीय था, आज नितांत अकेला हो गया है. वो स्वयं को क्या समयपूर्व ही वृद्ध नहीं महसूस करने लगेगा! ये कोई बेचारगी नहीं, एक वास्तविकता है. इसकी विभीषिका को हममें से बहुत से लोग अक्सर समझ नहीं पाते, हम क्यों भूल जाते हैं कि एक दिन इसी अवस्था से हम भी गुज़रेंगे, ये दिन सदैव एक जैसे नहीं रहेंगे. एक अजीब कशमकश में हूँ कि सदैव अपनी ऊर्जा श्रोत बने रहे पिता जी को कल क्या कह दूं कि कि वो कभी मन से वृद्ध न हों. उन्हें देखकर जब बहुत से स्वार्थी सहकर्मी एक औपचारिकता भरा अभिवादन करके मुंह फेर लें तो वो मुस्कुरा कर आगे बढ़ने का साहस रखें, ऐसा क्या करूँ कि वो सेवानिवृत्त होकर भी जीवन को उसी उत्साह से जीते रहें...
क्या आपने भी अपनो को यूँ ही सेवानिवृत्त होते देखा है? यदि हाँ, तो क्या किया था आपने उनके लिए?
मैं भी कुछ तो करूंगी, आखिर मेरे लिए ये बात आम नहीं... पर हाँ शायद बहुतों के लिए कुछ ख़ास भी नहीं......
स्वर्णिमा "अग्नि"
क्या आपने भी अपनो को यूँ ही सेवानिवृत्त होते देखा है? यदि हाँ, तो क्या किया था आपने उनके लिए?
मैं भी कुछ तो करूंगी, आखिर मेरे लिए ये बात आम नहीं... पर हाँ शायद बहुतों के लिए कुछ ख़ास भी नहीं......
स्वर्णिमा "अग्नि"
Wednesday, June 2, 2010
एक अहसान और कर दो...
कुछ भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सिर्फ काव्य का सहारा लिया जा सकता है, क्योंकि उसी में इतनी गहराई होती है कि कहे अनकहे सभी शब्दों को स्वयं में समेट सके. कई बार हतप्रभ रह जातीं हूँ आसपास ऐसा कुछ घट रहा होता है. व्यक्त कर देना कई घावों पर मरहम लगा देता है. शायद ये पंक्तियाँ मन की टीस कह पाएं:
कोई इन्हें दोस्ती के मायने समझाए,
आज अहसान जताने वाले कभी खुद को दोस्त कहते थे!
गलती की है आज इन्होंने, या कल ये गलत थे,
इनकी गलतियों के इल्ज़ाम हम अपने सर लेते हैं!!
गज़ब का देखिये ये भी रिश्ता है,
कल सर पर बिठाते थे, आज सर कलम करते घूमते हैं,
पर हम भी हम ठहरे,
हम तब भी खुश थे, हम आज ये भी सहते हैं/
याद हैं हमें अपनी गलतियाँ, पर शायद तुम भूल गए,
एक शाम अपनी गलतियों पर, तुम भी रोए थे,
तुम भूल गए एक वादा, कि अच्छा बुरा हमारे बीच रहेगा,
वादाखिलाफी हमने नहीं की,
पर हम पर सवाल उठाने वाले अक्सर तुम्हारा नाम लेते हैं/
हमने सोचा था दोस्ती नहीं तो अनजान राहें सही,
पर तुमने ना दोस्ती छोड़ी ना दुश्मनी ही,
आज सोचतीं हूँ हर अपने से दूरी भली है,
ईमान बदलते इंसां का कुछ देर लगती नहीं/
कभी जो सामने आ जाओ तो आखें फेर लेना,
शिकायतें बहुत हैं तुम्हें, इन नज़रों से क्या देखोगे सही?
ये नाम फिर जुबां पर मत लाना,
हमें यकीं है दोस्ती की मौत पर ये रस्म निभाना तुम भूलोगे नहीं/
एक चुभन और बाकी है,
अब अहसान करके कभी कहना नहीं,
कहते ही ये मिट्टी हो जाते हैं,
"करके भूल जाना!!", इस अजनबी पर तेरा अंतिम अहसान होगा यही//
स्वर्णिमा "अग्नि"
कोई इन्हें दोस्ती के मायने समझाए,
आज अहसान जताने वाले कभी खुद को दोस्त कहते थे!
गलती की है आज इन्होंने, या कल ये गलत थे,
इनकी गलतियों के इल्ज़ाम हम अपने सर लेते हैं!!
गज़ब का देखिये ये भी रिश्ता है,
कल सर पर बिठाते थे, आज सर कलम करते घूमते हैं,
पर हम भी हम ठहरे,
हम तब भी खुश थे, हम आज ये भी सहते हैं/
याद हैं हमें अपनी गलतियाँ, पर शायद तुम भूल गए,
एक शाम अपनी गलतियों पर, तुम भी रोए थे,
तुम भूल गए एक वादा, कि अच्छा बुरा हमारे बीच रहेगा,
वादाखिलाफी हमने नहीं की,
पर हम पर सवाल उठाने वाले अक्सर तुम्हारा नाम लेते हैं/
हमने सोचा था दोस्ती नहीं तो अनजान राहें सही,
पर तुमने ना दोस्ती छोड़ी ना दुश्मनी ही,
आज सोचतीं हूँ हर अपने से दूरी भली है,
ईमान बदलते इंसां का कुछ देर लगती नहीं/
कभी जो सामने आ जाओ तो आखें फेर लेना,
शिकायतें बहुत हैं तुम्हें, इन नज़रों से क्या देखोगे सही?
ये नाम फिर जुबां पर मत लाना,
हमें यकीं है दोस्ती की मौत पर ये रस्म निभाना तुम भूलोगे नहीं/
एक चुभन और बाकी है,
अब अहसान करके कभी कहना नहीं,
कहते ही ये मिट्टी हो जाते हैं,
"करके भूल जाना!!", इस अजनबी पर तेरा अंतिम अहसान होगा यही//
स्वर्णिमा "अग्नि"
Friday, May 14, 2010
"कुछ कर दिखाओ कि पता चले जिंदा हो, चलती फिरती लाशों से चमन भरा दिखता है!"
आज फिर एक अलसाई सुबह में ज़िन्दगी के मायने ढूँढती अपने ऑफिस में बैठी हूँ. बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं, कम समय का बहाना क्या बनाना जब कई बार स्वयं हम ही उचित समायोजन नहीं कर पाते. कितने ही दिन से बस काम करती जा रहीं हूँ, सुबह उठ कर एक निर्धारित समयसारिणी के तहत सब कुछ होता चला जाता है और शाम होने पर जब एक और दिन बीत जाता है तो भविष्य की इमारत के लिए नींव खोदने का काम एक दिन और पूरा हो जाता है. मन में उत्साह है कुछ करने का और साथ ही विश्वास भी कि ये जीवन निरर्थक तो नहीं जाएगा. इस विश्व में कितने ही लोग जन्म लेते हैं और बस रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते, अपने परिवारों का भरण पोषण करते एक दिन चुपचाप इहलीला समाप्त करते हैं. पर क्या यही जीवन का उद्देश्य है? नहीं.. कदापि नहीं! हृदय चीत्कार करता है कि सिर्फ इस धरती पर जन्म लेने, अपना परिवार बढ़ाने और उसका भरण पोषण करने में ही व्यक्ति मात्र का कर्त्तव्य निहित नहीं. सोचिये यदि ऐसा ही सब करते रहते तो हम आज भी आदिमानव बने रहते. जीवन तो कंदमूल, कच्चा या भुना मांस खाकर भी जिया जा सकता है, फिर भी हम में से ही कुछ लोग लगातार सार्थकता के साथ सोचते रहे, आविष्कार होते रहे, कुछ नियम बने और फिर टूटे जिससे मानवता लगातार विकास करती गई और आज हम यहाँ हैं! पर क्या यहाँ रुक जाना ही नियति है? क्या प्रगति करते जाना जीवन का दूसरा नाम नहीं? आज आप में से बहुत से प्रायः ऐसा ही सोचते होंगे, परन्तु ज़िम्मेदारियों से जकड़े होंगे. लेकिन याद रखिये कि इन्हीं ज़िम्मेदारियों से समय निकालकर कुछ कर गुजरने में जीवन की सच्ची सार्थकता है. कहीं ऐसा न हो कि जीवन की संध्या में आप भी ये कहते पाए जाएँ कि करना तो हम भी बहुत कुछ चाहते थे परन्तु जीवन ने मौका ही कब दिया, वास्तव में सत्य ये होगा कि स्वयं आपने ने अपने आप को मौका नहीं दिया. तो उठिए, और आज कुछ समय निकल कर एक बार फिर सोचिये कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? सिर्फ इसे जिये जाना, या इसे सार्थकता के साथ जीना? ज़रा नज़र घुमा कर देखिये, बहुतों को आपकी धनात्मक ऊर्जा की आवश्यकता है, यहाँ बहुत कुछ है करने को, बस करने वाला चाहिए....
"कुछ कर दिखाओ कि पता चले ज़िंदा हो, चलती फिरती लाशों से चमन भरा दिखता है ..."
स्वर्णिमा "अग्नि"
"कुछ कर दिखाओ कि पता चले ज़िंदा हो, चलती फिरती लाशों से चमन भरा दिखता है ..."
स्वर्णिमा "अग्नि"
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